Home ताज़ा खबर यरुशलम का इतिहास, क्यों खास है ये शहर इस्लाम के लिए खास

यरुशलम का इतिहास, क्यों खास है ये शहर इस्लाम के लिए खास

by awaztimes
jerusalem

इतिहास के पन्नों के अनुसार इस जगह पर पहली बार मानव 3500 बीसी (BC) के आसपास बसे थे. जिसके बाद 1000 बीसी में इस जगह पर यहूदी शासक डेविड द्वारा शासन किया गया था और उन्होंने इस जगह को अपनी राजधानी का दर्जा दिया था. इस स्थान पर उनके बेटे सुलैमान द्वारा पहले पवित्र यहूदी मंदिर का निर्माण किया गया था. मगर इस मंदिर को बेबीलोनियन द्वारा 586 ईसा पूर्व में नष्ट कर दिया गया था और यहूदियों को इस जगह से निकाल दिया गया था. इस घटना के 50 साल बाद फ़ारसी राजा साइरस ने यहूदियों को जेरुसलेम लौटने और यहां पर अपने मंदिर का पुनर्निर्माण करने की अनुमति दी थी.जेरुसलेम में कई शासकों द्वारा राज किया गया है और इन्हीं शासकों में से एक शासक सिकंदर भी थे. सिकंदर ने भी इस शहर को युद्ध कर के जीता था और यहां अपने राज्य की स्थापना की थी. वहीं इस जगह पर ऑटोमन साम्राज्य का भी शासन रहा है. ये साम्राज्य तुर्कों द्वारा स्थापित किया गया था.जेरुसलेम पर ग्रेट ब्रिटेन द्वारा भी शासन किया गया है. इस शहर पर पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने कब्जा कर लिया था. जेरुसलेम के जिस हिस्से पर ब्रिटेन ने कब्जा किया था, वो जगह इस वक्त फिलिस्तीन का हिस्सा है.
वहीं साल 1948 में इजराइल देश बनने के बाद जेरुसलेम जगह को दो हिस्सों में बांट दिया गया था और इस जगह के एक हिस्से में इजराइल का कब्जा हुआ करता था, जबकि दूसरे हिस्से पर जॉर्डन देश का. जिसके बाद इजराइल ने 1967 में हमला करके पूरे जेरुसलेम पर अपना कब्जा कर लिया था. वहीं इजराइल ने जेरुसलेम पर कब्जा करने के बाद अरब (फिलीस्तीनी) निवासियों को स्थायी निवासी का दर्जा तो दे दिया, लेकिन उनको नागरिकता नहीं दी. इसी लड़ाई में इजराइल ने वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में भी पूरी तरह काबू पा लिया था और इन दोनों इलाकों में बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी जनसंख्या है. इस समय वेस्ट बैंक को केवल दिखावे मात्र के लिए फिलीस्तीनी प्राधिकरण द्वारा चलाया जाता है, जबकि ये हिस्सा इजराइल के अधिकारों के अंतर्गत चलाया जाता है. वहीं फिलिस्तीनी इसे अपना फिलिस्तीन देश मानते हैं. इतना ही नहीं दुनिया के कुल 135 लोगों द्वारा फिलिस्तीन को एक देश माना जाता है.
यहां पर मुस्लिमों की मस्जिद अल-हरम है। यहीं पास में अल अक्सा मस्जिद है। इसी के पीछे है पश्चिमी दीवार जो यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल है। इससे एक किलोमीटर की दूरी पर है ईसाई धर्म का सबसे पवित्र चर्च। यहूदियां का यहां सबसे पवित्र मंदिर था जिसे 72वीं सदी में रोमनों ने तोड़ दिया था। अब इस मंदिर की एक दीवार ही बची है।येरुशलम एक ऐसा नाम है जो ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों के दिल में सदियों से विवादित इतिहास के बीच बसता आ रहा है. हिब्रू में इसे येरुशलाइम और अरबी में अल-कुद्स के नाम से जाना जाता है.ये दुनिया के सबसे पुराने शहरों में एक है. इसे जीता गया, ये तबाह हुआ और फिर बार-बार उठ खड़ा हुआ. इसका ज़र्रा ज़र्रा इसे इसकी अतीत की पहचान से जोड़ता है.यहीं पवित्र गुंबदाकार ‘डोम ऑफ़ रॉक’ यानी क़ुब्बतुल सख़रह और अल-अक्सा मस्जिद है. यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ़ या पवित्र स्थान कहते हैं.ये मस्जिद इस्लाम की तीसरी सबसे पवित्र जगह है, इसकी देखरेख और प्रशासन का ज़िम्मा एक इस्लामिक ट्रस्ट करता है, जिसे वक़्फ़ भी कहा जाता है.मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर अपनी रात्रि यात्रा में मक्का से यहीं आए थे और उन्होंने आत्मिक तौर पर सभी पैगंबरों से दुआ की थी.क़ुब्बतुल सख़रह से कुछ ही की दूरी पर एक आधारशिला रखी गई है जिसके बारे में मुसलमान मानते हैं कि मोहम्मद यहीं से स्वर्ग की ओर गए थे.मुसलमान साल भर यहां आते हैं लेकिन पवित्र रमज़ान माह के हर शुक्रवार को मस्जिद में हज़ारों मुसलमान नमाज करने के लिए इकट्ठा होते हैं.यहीं पवित्र गुंबदाकार ‘डोम ऑफ़ रॉक’ यानी क़ुब्बतुल सख़रह और अल-अक्सा मस्जिद है. यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ़ या पवित्र स्थान कहते हैं.यहीं पवित्र गुंबदाकार ‘डोम ऑफ़ रॉक’ यानी क़ुब्बतुल सख़रह और अल-अक्सा मस्जिद है. यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ़ या पवित्र स्थान कहते हैं.

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