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एनपीआर क्या है? ये कब लागू होगा

by awaztimes
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नरेंद्र मोदी सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में फैसला लिया है कि 2021 की जनगणना के साथ नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर को भी अपडेट किया जाएगा. केंद्र सरकार ने एनपीआर के लिए 3500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है जो अगले साल अप्रैल, 2020 से सितंबर, 2020 के बीच किया जाएगा. सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस ब्रीफिंग में फैसले की जानकारी देते हुए कहा है कि एनपीआर का नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी से कोई संबंध नहीं है. देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि वो एनपीआर को लागू नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि ये एनआरसी की दिशा में एक कदम है.
क्या है नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर एनपीआर- राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर या राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर एक ऐसा सरकारी दस्तावेज है जिसमें दर्ज निवासियों की लिस्ट से ये पता चलता है कि ये आदमी एक खास एरिया में कम से कम पिछले छह महीने से रह रहा है या कम से कम अगले छह महीने और रहने की मंशा रखता है. इसमें भारत के निवासियों की गांव से तहसील, तहसील से जिला और जिला से राज्य और राज्य से देश स्तर तक की लिस्ट होती है.
नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर एनपीआर में नाम लिखाने के लिए क्या करना होगा, क्या दस्तावेज देना होगा
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने के लिए जनगणना अधिकारियों के सवालों के जवाब देने होंगे. इसमें किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं है. लोग जो जवाब देंगे उसे ही अधिकारी दर्ज करेंगे और उसी के अधार पर रजिस्टर में सूचना दर्ज करेंगे. जनगणना अधिकारी आपका नाम, आपके माता-पिता का नाम, पत्नी, बच्चा समेत आपके परिवार के सदस्यों के नाम, जन्मदिन, राष्ट्रीयता, वर्तमान पता, स्थायी पता, रोजगार और शैक्षणिक योग्यता वगैरह पूछकर एक फॉर्म में दर्ज करेंगे लेकिन किसी भी जवाब के लिए प्रूफ में कोई दस्तावेज नहीं मांगेंगे. जनगणना में बायोमेट्रिक डेटा आधार के जरिए दिया जा सकता है और अगर आधार नंबर ना हो तो उसे आधार कार्ड लेने की प्रक्रिया के तहत हासिल किया जा सकता है. ये सारे काम 1 अप्रैल, 2020 से शुरू होगा.
नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर एनपीआर कैसे तैयार होता है
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के लिए लोगों के द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि करने के लिए राज्य सरकार स्थानीय स्तर पर रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी. भारतीय नागरिक कौन है इसका नियम स्पष्ट है. उस नियम के मुताबिक अगर किसी की नागरिकता संदिग्ध लगती है तो उसे रजिस्ट्रार नोटिस जारी करेगा. रजिस्ट्रार उसके जवाब के आधार पर फैसला लेगा कि उसे एनपीआर में शामिल किया जाए या नहीं. फिर हर इलाके के लोगों का एनपीआर का मसौदा प्रकाशित करके लोगों से आपत्तियां मांगी जाएंगी. रजिस्ट्रार आई आपत्तियों पर विचार करके फैसला लेगा और फिर रजिस्टर को अपडेट करेगा. रजिस्ट्रार फिर अपनी लिस्ट जिला रजिस्ट्रार को सौंप देगा और रजिस्ट्रार ने जिनके दावे खारिज कर दिए वो जिला रजिस्ट्रार के पास अपील कर सकते हैं. जिला रजिस्ट्रार अगर किसी की अपील मान लेता है तो उसे रजिस्टर में डाल दिया जाएगा और फिर वो रजिस्टर राज्य स्तर पर भेज देगा जो वहां से राष्ट्रीय रजिस्टर का हिस्सा बन जाएगा.

किसी का नाम एनपीआर में छूट जाए तो क्या होगा

नेशनल जनसंख्या रजिस्टर देश की आबादी का रजिस्टर है इसलिए उसमें हरेक निवासी का नाम होगा. अगर किसी का नाम छूट गया है तो वो अनुमंडल स्तर के रजिस्ट्रार के पास आवेदन कर सकता है जो लोकल रजिस्ट्रार से एक लेवल ऊपर का अधिकारी है.

एनपीआर का एनआरसी से क्या संबंध है

जब राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर का काम पूरा हो जाएगा तो जनगणना आयुक्त लोकल रजिस्ट्रार को नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी तैयार करने को कहेगा. रजिस्ट्रार उन लोगों से सूचना मांगेगा जिनके नाम के आगे एनपीआर में कुछ रिमार्क्स दर्ज होंगे. इनको रजिस्ट्रार द्वारा मांगे गए दस्तावेज देने होंगे. जनगणना आयोग एनआरसी से उनके नाम हटा देगा जो नागरिक नहीं हैं. गैर नागरिक घोषित आदमी जनगणना आयुक्त के फैसले के खिलाफ 30 दिन के अंदर निर्धारित अथॉरिटी के पास अपील कर सकता है.

एनपीआर और एनआरसी में क्या अंतर है

एनआरसी 2011 की जनगणना में एनपीआर का एक हिस्सा था. एनआरसी की तरह एनपीआर देश की नागरिकता की सूची नहीं है क्योंकि एनपीआर में वो विदेशी भी दर्ज होते हैं जो एक जगह पर छह महीने से ज्यादा से रह रहे हों. एनआरसी के जरिए नागरिकता तय होती है और उसका एक यूनिक नंबर होता है जबकि एनपीआर में ऐसा नहीं होता.

क्या राज्य सरकारों की भागीदारी के बिना एनपीआर का काम हो सकता है

नियमों की बात करें तो राज्यों के बिना एनपीआर पूरा करना केंद्र सरकार के लिए मुश्किल होगा. एनपीआर नियमों के तहत लोकल, अनुमंडल, जिला रजिस्ट्रार और अपील अधिकारियों की नियुक्ति राज्य सरकार को करनी है. नियमों के तहत नगर निकाय और ग्रामीण निकाय की भी भागीदारी होती है. केंद्र सरकार चाहे तो स्वतंत्र एजेंसी से जनसंख्या डेटा जमा करवा सकती है लेकिन उसकी आधिकारिक पुष्टि के लिए भी राज्य सरकार के अधिकारियों की जरूरत होगी.

कितने और किन राज्यों ने कहा है कि वो एनपीआर को लागू नहीं करेंगे

भारत के दस राज्यों ने कहा है कि वो एनपीआर को लागू नहीं करेंगे. इन राज्य सरकारों में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार, केरल की पिनराई विजयन सरकार, पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार, आंध्र प्रदेश की वाईएस जगनमोहन रेड्डी सरकार, बिहार की नीतीश कुमार सरकार, ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार, राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार, छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार, मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार और महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार है. इन राज्यों में बिहार ऐसा राज्य है जहां बीजेपी सरकार में शामिल है. इन राज्यों ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद ये कहा है कि वो एनपीआर को अपने यहां लागू नहीं करेंगे.

एनपीआर के फायदे जो सरकार गिना रही है

सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि एनपीआर से सरकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में काफी मदद मिलेगी क्योंकि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के डेटा से लाभार्थियों की पहचान आसान हो जाएगी. एनपीआर डेटा से लोगों की तंगहाली का भी पता चलेगा. कई राज्य 2015 में जुटाए गए एनपीआर डेटा के आधार पर सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों को दे रहे हैं.

एनपीआर का इतिहास, आधार से कनेक्शन

केंद्र सरकार ने 2003 में नागरिकता नियम बनाए थे जिसके तहत राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की प्रक्रिया तय की गई थी. 2011 की जनगणना के साथ 2010 में राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर के लिए डेटा जुटाया गया था. इस डेटा को 2015 में अपडेट किया गया जिसके लिए घर-घर जाकर सर्वे किए गए. अपडेट प्रक्रिया के जरिए 117 करोड़ लोगों का डेटा डिजिटल तरीके से दर्ज किया गया जो उस समय देश की आबादी का 97 परसेंट था. 40 परसेंट लोगों का बायोमेट्रिक डेटा या आधार भी एनपीआर के साथ लिंक किया गया है. 2020 में अप्रैल से सितंबर के बीच सरकार जनगणना के साथ-साथ एनपीआर को अपडेट करेगी और बची हुई 60 परसेंट आबादी का बायोमेट्रिक डेटा आधार के जरिए एनपीआर से लिंक कर दिया जाएगा.

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